teachers day speech in hindi।। शिक्षक दिवस पर हिंदी में भाषण

नमस्कार आज हम बात करने जा रहे हैं शिक्षक दिवस के बारे में साथियों शिक्षक दिवस इस भारत भूमि पर जन्मे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की याद में हर वर्ष 5 सितंबर को मनाया जाता है। साथियों डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का नाम बीसवीं सदी के विद्वानों में सबसे शीर्ष पर आता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक दार्शनिक एक राजनैतिक  एक शिक्षक व भारत के पहले उपराष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। 1954 में उनको सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया। व सन 1962 से डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में उनके जन्मदिवस 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मना कर उनके योगदान को याद कर उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।

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साथियों इस मां भारती की धरा पर शिक्षकों का सम्मान प्राचीन समय से ही रहा है। इसीलिए भारत देश को विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है

गुरु को ब्रह्मा विष्णु महेश कहां गया है जैसे कि गुर्रुर ब्रह्मा गुर्रुर विष्णु गुर्रुर देवो महेश्वरः गुर्रुर साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः संत कबीर दास जी गुरु का महत्व समझाते हुए गाते थे। “गुरु गोविंद दोऊ खडे काके लागू पाय बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताय कबीरा गोविंद दियो बताय” अर्थात गुरु और गोविंद एक साथ खड़े हो तो किसे प्रणाम करना चाहिए।

ऐसी स्थिति में गुरु के श्री चरणों में शीश झुकाना उत्तम है। जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविंद के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लेकिन साथियों समय अनुसार बदलती हुई व्यवस्थाओं व शिक्षा के बाजारीकरण में शिक्षक के महत्व को गौण कर दिया है।

आज के दिन शिक्षा को एक व्यापार के रूप में देखा जाने लगा है। इस शिक्षा व्यवस्था में ऐसे लोग भी प्रवेश कर गए हैं। जिनका शिक्षा व नैतिकता से दूर – दूर तक कोई नाता नहीं है। उनको सिर्फ मोटी फीस व ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना ही अच्छा लगता है। इस फीस का बड़ा हिस्सा स्कूल सुविधाओं के नाम पर वसूलता है। व मोटा पैसा स्कूल का मालिक कमाता है। शिक्षकों को तो औसत वेतन ही मिल रहा है। इस व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि विद्यार्थी का शिक्षक के प्रति विश्वास कम हो गया है। व आत्मीयता स्नेह और आदर को तिलांजलि दी जा रही है। अगर प्राचीन व्यवस्था को देखा जाए तो शिक्षा पूरी होने के बाद शिष्य गुरु दक्षिणा स्वरूप गुरु को जो सामर्थ्य अनुसार दे पाता था।

गुरु स्वीकार करते थे। हर अमीर गरीब को एक ही तरह की तालीम प्रदान करते थे।आज के दिन ऐसा संभव नहीं है। यह शिक्षा व्यवस्था माता – पिता समाज व हर जगह अपना दशं दिखा रही है। आज के संदर्भ में यह शब्द कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी

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गुरु अब शिक्षा को बेचने वाले तरफदार बन गए। स्कूल अब व्यापार बन गए। शिष्य अब गुरु के ग्राहक बन गए। शिष्य अब नंबरों के लिए आंख दिखाने वाले होशियार बन गए। क्योंकि स्कूल अब व्यापार बन गए ये पैसे गुरु शिष्य के रिश्ते को दरकिनार कर गए आजकल कहां रहती है। दिल में गुरु के चरणों में शीश झुकाने की अब तो बस लगी रहती है। मन में फीस कम करवाने की माता-पिता खुश होते हैं। हमारा बच्चा शिक्षा पा एक बड़ा आदमी बन जाएगा। वह इन हर चौक-चौराहों व गली मोहल्लों में खुली शिक्षा की दुकानों में शिक्षा पा वह माता पिता व गुरु शिष्य के रिश्ते को निभायेगा। अजी! लेकिन यह मत भूलो इस बच्चे ने एनुअल डे पर मार्केटिंग सीखी है। सिर्फ दिखावे के अलावा इन स्कूलों की शिक्षा फिकी है। इन बच्चों ने तो हर साल स्कूल फीस को ऊपर जाते देखा है। लेट फीस वाले बच्चों को क्लास टीचर के आगे गिड़गिड़ाते देखा है | हर कदम – कदम पर पैसे को आड़े आते देखा है। यह मत भूलो वह इसी सीख को जीवन में अपनायेगा।  आने वाले समय में पैसों की खातिर  वह माता-पिता व गुरु की महिमा को भूल जाएगा और हर रिश्ते में वह पैसा ही बनाना चाहेगा 

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लेकिन साथियों आज शिक्षकों अभिभावकों व विद्यार्थियों में व्यवस्थाओं के कारण कितने ही मतभेद हो हमें हमारे शिक्षकों को अवश्य सम्मान देना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए महाभारत काल के बालक एकलव्य को बालक एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य को अपना गुरु मानते थे। लेकिन गुरु द्रोणाचार्य ने बालक एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया था। तो बालक एकलव्य एकांत जंगल में गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाकर मूर्ति से प्रेरणा लेकर धनुर्विद्या सीखने लगा। उसकी गुरुभक्ति व एकाग्रता के कारण वह धनुर्विद्या में बहुत ही निपुण हो गया। संयोगवश गुरु द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों को लेकर एक बार जंगल में आए तो उनके साथ एक कुत्ता था। जो थोड़ा आगे निकल गया। कुत्ता वहां पहुंच गया। जहां बालक एकलव्य धनुर्विद्या सीख रहे थे। वह बालक एकलव्य को देखकर भौंकने लगा। तो बालक एकलव्य ने सात बाण छोड़कर कुत्ते के मुंह को बाणों से भर दिया। बाणों से भरा मुंह लेकर कुत्ता गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचा। तब अर्जुन ने कुत्ते को देखकर कहा गुरुदेव यह विधा तो मैं भी नहीं जानता। यह कैसे संभव हुआ। तो गुरु द्रोणाचार्य ने आगे जाकर देखा तो बालक एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति के सामने बैठ धनुर्विद्या सीखने में लगा हुआ है। गुरु द्रोणाचार्य बालक एकलव्य की अटूट श्रद्धा को देखकर बोले मेरी मूर्ति को सामने रखकर धनुर्विद्या तो सीख ली। किंतु मेरी गुरु दक्षिणा कौन देगा। तो बालक एकलव्य ने कहा गुरुवर जो आप मांगे। तो गुरु द्रोणाचार्य ने कहा तुम्हे मुझे दाएं हाथ का अंगूठा देना होगा। बालक एकलव्य ने एक पल में बिना विचार किये अंगूठा गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर दिया। धन्य है वह बालक एकलव्य जिसने साहस त्याग व समर्पण का परिचय दिया। जिसके कारण आज भी बालक एकलव्य को गुरु भक्ति के लिए याद किया जाता है। शब्दों के साथ मैं सभी गुरुओं को नमन करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूं। जय हिंद जय भारत

इस भाषण को सुनने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें https://youtu.be/z1O-bkSgFyo

The Author

लेखक:- सविता रामभरोसे

नमस्कार वेबसाइट बाल संसार हिंदी में आपका स्वागत है।सविता जी जिन्होंने हिंदी विषय से  स्नातकोत्तर व बीएड की डिग्री अर्जित की है।श्री रामभरोसे जी ऐसे हैं। भई रामभरोसे 1998 में किसी तरह दसवीं कर पाये ,2006 में 12वीं कर आये, 2012 में स्नातक कर पाये, 2014 में अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर की डिग्री ले आये। आर्टिकल में सब लिखने के बाद सविता जी से चेक करवाये बाल संसार हिंदी के वेब डेवलपर कंटेंट राइटर लेखक सभी की भूमिका यह अकेले ही निभाये। बस इतना ही है। कि आप इनके नाम से परिचित हो जाएं रामभरोसे समझकर इनका साथ निभाएं धन्यवाद

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