Category: हिन्दी में भाषण व निबंध

डॉ ए.पी.जे अब्दुल कलाम पर निबंध

प्रस्तावना

भारतवर्ष के 11वें राष्ट्रपति मिसाइल मैन के नाम से विख्यात एक महान वैज्ञानिक डॉ अबुल पाकीर जैनुल आब्दीन अब्दुल कलाम जो की बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनका विश्व के विकास के लिए योगदान हमारे लिए प्रेरणादायक है।

एपीजे अब्दुल कलाम जी का प्रारंभिक जीवन

एपीजे अब्दुल कलाम जी का जन्म तमिलनाडु के रामेश्वरम में 15 अक्टूबर सन 1931 में जैनुलआब्दीन के घर पर हुआ था । उनकी माता का नाम अशिअम्मा था। उनके पिता जैनुलआब्दीन नाव चलाते थे व उनकी मां एक ग्रहणी थी। इस गरीब मुस्लिम परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी। इसलिए कलाम जी को कम उम्र में ही काम करना पड़ा अपने पिता की आर्थिक मदद करने के लिए। वह स्कूल के बाद समाचार पत्र वितरण का काम करने लगे अपने स्कूल के दिनों में कलाम पढ़ाई लिखाई में सामान्य थे।पर वह नई चीजों को सीखने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उनके अंदर सीखने की बहुत जिज्ञासा थी।उन्होंने अपनी स्कूल की शिक्षा के बाद तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में दाखिला लिया।जहां से उन्होंने साल 1954 में भौतिक विज्ञान में स्नातक किया उसके बाद वर्ष 1955 में उन्होंने मद्रास से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की शिक्षा ग्रहण की व वर्ष 1960 में मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।

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अब्दुल कलाम जी की सेवाएं

अपनी शिक्षा के बाद कलाम जी ने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) में एक वैज्ञानिक के तौर पर अपने कैरियर की शुरुआत की। जहां पर उन्होंने भारतीय सेना के लिए एक छोटे हेलीकॉप्टर का डिजाइन तैयार किया इतना करने के बाद भी डीआरडीओ में कलाम जी को अपने काम से संतुष्टि नहीं मिल रही थी।साथ ही कलाम जी पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा गठित इंडियन नेशनल कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च के सदस्य थे। जिसके कारण उन्हें प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के साथ कार्य करने का मौका मिला। व सन 1969 में उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में भारत के सैटलाइट लॉन्च व्हीकल परियोजना के निदेशक के तौर पर अपनी सेवाएं देना प्रारंभ किया। इस परियोजना में सफलता हासिल करते हुए कलाम जी ने भारत का प्रथम उपग्रह रोहिणी पृथ्वी की कक्षा में वर्ष 1980 में स्थापित किया।अपने इस कार्यकाल के दौरान उन्होंने अमेरिका की अंतरिक्ष संगठन नासा की यात्रा की व परमाणु वैज्ञानिक राजा रामन्ना ने भी कलाम जी को वर्ष 1974 में पोखरण में परमाणु परीक्षण देखने के लिए बुलाया था। 70 और 80 के दशक में उनके कार्यों और उनकी सफलताओं को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें कैबिनेट की मंजूरी लिए बिना ही कुछ गुप्त परियोजनाओं पर काम करने की अनुमति दे दी। इस समय के दौरान उन्होंने इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम प्रारंभ किया व इस योजना के मुख्य कार्यकारी रहे व भारतवर्ष को अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें देकर मिसाइल मैन कहलाए जुलाई 1992 से लेकर दिसंबर 1999 तक उन्होंने प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन डीआरडीओ के सचिव का कार्यभार संभाला व आर. चिदंबरम के साथ मिलकर कलाम जी ने भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण में अहम भूमिका निभाई व सबसे बड़े परमाणु वैज्ञानिक बन गए। व आगे चलकर उन्होंने भारत के 11वें गैर राजनीतिक राष्ट्रपति के तौर पर देश के प्रथम नागरिक होने का गौरव प्राप्त किया।

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एपीजे अब्दुल कलाम जी का शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में योगदान

डॉक्टर अबुल पाकिर जैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम जी ने राष्ट्रपति पद से सेवा मुक्त होने के बाद शिक्षण लेखन मार्गदर्शन और शोध जैसे कार्यों में अपना जीवन व्यतीत करना शुरू किया।वह भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद,भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर, भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग,भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी तिरुवंतपुरम,अन्ना यूनिवर्सिटी चेन्नई में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर,व आईआईटी हैदराबाद,बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आदि में सूचना प्रौद्योगिकी भी पढ़ाया, व इन सभी में गेस्ट फैकेल्टी के रूप में अपनी सेवाएं दी, वर्ष 2011 में उनके जीवन के ऊपर आई एम कलाम फिल्म प्रदर्शित की गई

कलाम जी को मिले सम्मान व पुरस्कार

भारतवर्ष व विश्व समाज के लिए किए गए अनेक कार्यों के लिए डॉ एपीजे अब्दुल कलाम जी को विभिन्न सम्मान व पुरस्कार दिए गए जिन में मुख्यतः 40 विश्वविद्यालयों के द्वारा दी गई मानद डॉक्टरेट की उपाधि और भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण, पद्म विभूषण,और भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न से उनको अलंकृत किया गया।

एपीजे अब्दुल कलाम जी का देहांत

डॉक्टर अब्दुल पाकिर जैनुलआब्दीन कलाम जी ने भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग में बच्चों को उद्बोधन देते हुए दिल का दौरा पड़ने के कारण 27 जुलाई 2015 को अपनी आखिरी सांसें ली कलाम साहब हमें सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।

उपसंहार

एक युगपुरुष महान वैज्ञानिक एक दार्शनिक कर्म योगी और खुशहाल भारत के स्वप्न द्रष्टा डॉक्टर अब्दुल पाकिर जैनुलआब्दीन कलाम जी का निधन संपूर्ण भारतवर्ष के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। इसे भर पाना नामुमकिन है लेकिन हम उनके आदर्शों पर चलकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं कलाम साहब सदैव हमारे दिलों में अमर रहेंगे।

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दुर्गा पूजा पर निबंध ।। Essay on Durga Puja in hindi

प्रस्तावना

दुर्गात्सव मतलब दुर्गा पूजा भारतवर्ष में मनाए जाने वाला एक धार्मिक त्यौहार है। दुर्गा देवी जो कि शक्ति का अवतार हिमालय और मेनका की पुत्री थी। और बाद में उनकी शादी भगवान शिव से हुई थी। दुर्गा पूजा मनाना सर्वप्रथम भगवान राम ने रावण को मारने के लिए देवी दुर्गा से शक्ति प्राप्त कर उनकी पूजा करने के बाद से शुरू किया गया। दुर्गा पूजा का त्यौहार हिंदू धर्म के लोगों द्वारा हर वर्ष उत्साह और विश्वास के साथ मनाया जाता है।जो कि हिंदुओं के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह हर साल पतझड के मौसम में आता है। दुर्गा पूजा के त्यौहार को भारतवर्ष के हर गांव और शहर में सांस्कृतिक व परंपरागत तरीके से मनाया जाता है।

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दुर्गा पूजा के नाम व मान्यताएं

दुर्गा पूजा के नाम:- दुर्गा पूजा को बिहार उड़ीसा दिल्ली मध्य प्रदेश वेस्ट बंगाल में दुर्गा पूजा के नाम से जाना जाता है।वही बंगाल असम व उड़ीसा में अकालबोधन दुर्गा का असामयिक जागरण शरद कालीन पूजा, बांग्लादेश में दुर्गा पूजा को भगवती पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। दुर्गा पूजा के दिन लोग दुर्गा देवी की पूरे 9 दिन तक पूजा कर अंत में दुर्गा देवी की मूर्तियों व प्रतिमा को पानी में विसर्जित करते हैं व बहुत से लोग 9 दिन तक उपवास रखते हैं। और कुछ लोग केवल पहले और आखिरी दिन उपवास रखते हैं। लोगों का मानना है कि इससे देवी दुर्गा प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देती है। और उन्हें सभी समस्याओं और नकारात्मक उर्जा से दूर रखती है।

दुर्गा पूजा की कहानी

कहा जाता है कि एक बार महिषासुर नाम का एक राजा था। इस राजा ने स्वर्ग में देवताओं पर आक्रमण किया। जोकि महिषासुर एक बहुत ही शक्तिशाली राजा था जिसे कोई भी नहीं हरा सकता था। इस आक्रमण के समय ब्रह्मा विष्णु और शिव भगवान ने एक आंतरिक शक्ति का निर्माण किया जिसका नाम दुर्गा रखा गया था। इस देवी दुर्गा की शक्ति को महिषासुर का विनाश करने के लिए प्रयोग में लिया गया। जिसमें देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ पूरे 9 दिन तक युद्ध किया और अंततोगत्वा दसवें दिन महिषासुर को मार गिराया। तब से दसवें दिन को दशहरा या विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। वही रामायण के अनुसार भगवान श्री राम ने रावण को मारने के लिए दुर्गा देवी की पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लेने के लिए चंडी पूजा की थी। व श्री राम ने दुर्गा पूजा के दसवें दिन रावण को मारा था तभी से इस दिन को विजयदशमी कहा जाता है इसलिए देवी दुर्गा की पूजा हमेशा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानी जाती है।

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दुर्गा पूजा पर सांस्कृतिक उत्सव

दुर्गा पूजा के त्यौहार के लिए पूजा शुरू होने के लगभग 2 महीने पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती है। बाजारों में कपड़े गहने व हस्तशिल्प आदि से बनी हुई वस्तुओं की भरमार होती है।चारों तरफ बाजारों में दुकानें सजने लगती हैं। वहीं 3 से 4 महीने पहले मूर्तिकार मूर्तियां बनाना शुरु कर देते हैं। वहीं बहुत से गांव व शहरों में नाटक और रामलीला जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इन दिनों में पूजा के दौरान लोग दुर्गा पूजा मंडप में फूल नारियल अगरबत्ती और फल लेकर जाते हैं और मां दुर्गा का आशीर्वाद ले सुख व समृद्धि की कामना करते हैं।

वर्तमान युग में दुर्गा पूजा के प्रभाव

इस त्यौहार पर बढ़ते हुए आधुनिकीकरण के कारण लोग लापरवाही से पर्यावरण को बुरी तरह से दूषित कर रहे हैं।जहां पर देवी दुर्गा की प्रतिमा को बनाने और रंगने में जिन पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है। व स्थानीय पानी के स्रोतों में प्रदूषण का कारण बन रहे हैं।वही केमिकल से बनी हुई मूर्तियों को सीधे नदी के पानी में विसर्जित कर नदियों को गंदा किया जा रहा है।इस परंपरा को निभाने के लिए हमें कोई अन्य सुरक्षित तरीका निकालना चाहिए।

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उपसंहार

दुर्गा पूजा उत्सव से लोगों की मान्यता है कि इस उत्सव को मनाने से बुराइयों का नाश होता है।जिस प्रकार देवी दुर्गा ने सभी देवी देवताओं की शक्ति को इकट्ठा करके दुष्ट राक्षस महिषासुर का नाश किया था। और धर्म को बचाया था। इसी प्रकार हम लोगों को अपनी सभी बुराइयों पर विजय प्राप्त करके मनुष्यता को बढ़ावा देना चाहिए। यही दुर्गा पूजा का सही संदेश है।

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विश्व हृदय दिवस पर भाषण

साथियों जैसा कि आप सभी को विदित है। हर साल की तरह इस साल भी विश्व भर में विश्व हृदय दिवस का आयोजन किया जा रहा है जो कि हर साल 29 सितंबर को किया जाता है। इस दिवस के आयोजन का उद्देश्य विश्व भर में हृदय रोगों से हो रही मृत्यु से बचने के लिए हृदय रोगों से लोगों को जागरूक करना है। आप सभी जानते हैं कि हृदय हमारे शरीर का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग हैं।

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जिसके बिना हमारा जीना नामुमकिन है। लेकिन आज के इस आपाधापी वाले युग में मानव अपने शरीर पर ठीक से ध्यान नहीं रख पा रहा है। प्रतिदिन जीवन की भागदौड़ में वह अपने शारीरिक क्रियाओं को भूलता जा रहा है।जिसके कारण मानव शरीर में अनेकों बीमारियों ने जन्म ले लिया है।जिसमें बहुत ज्यादा संख्या में हृदय रोगी भी पाए जा रहे हैं। साथियों इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए विश्व हृदय दिवस मनाने की शुरुआत सन 2000 में की गई। इस दिवस के दिन हृदय रोगों के प्रकार हृदय रोग होने के कारण व उनके निवारण के बारे में बात की जाती है। अगर इसके रोग के मुख्य कारणों की बात की जाए तो खानपान का सही नहीं होना, शारीरिक श्रम की कमी,तनावग्रस्त जीवन शैली, अत्यधिक शराब का सेवन तंबाकू व धूम्रपान करना है। लोगों में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रोल उच्च रक्तचाप डायबिटीज अधिक वजन व मोटापा आदि हैं। हमें हृदय संबंधित रोगों से बचने के लिए आज के समय में हमारी जीवन शैली में बदलाव करने की जरूरत है। हमें अपने खानपान को सुधारना होगा व अत्यधिक शारीरिक श्रम व व्यायाम कर शारीरिक क्रियाओं को सुचारू करना होगा।हमें अपने खान-पान में कम वसा व उच्च प्रोटीन युक्त आहार जैसे कि साबुत अनाज फलों तथा सब्जियों को शामिल करना चाहिए व डिब्बाबंद जमे हुए खाद्य पदार्थों का सेवन करने से बचना चाहिए शराब का सेवन तंबाकू व धूम्रपान जैसी आदतों को को छोड़ देना चाहिए।

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प्रत्येक दिन कम से कम 30 मिनट के लिए व्यायाम करें और नमक का सेवन कम कर दें वही मनोरंजनपूर्ण गतिविधियों द्वारा अपने तनाव को कम करें अपना वजन ब्लड प्रेशर ग्लूकोज और कोलेस्ट्रोल के स्तर को नियंत्रित रखें व समय-समय पर अपनी स्वास्थ्य जांच करवाएं आज विश्व हृदय दिवस के मौके पर हम सब अपनी जीवनशैली में इन सभी को अपनाने का प्रण लें आशा है आने वाले समय में हम हृदय रोग पर जागरूक होकर इस रोग को नियंत्रित कर सकेंगे धन्यवाद जय हिंद जय भारत

विश्व हृदय दिवस पर निबंध

प्रस्तावना

विश्व हृदय दिवस हर साल 29 सितंबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को हृदय से संबंधित रोगों से जागरूक करना है। इस दिवस की शुरुआत विश्व हृदय संघ के निदेशक एंटोनी बेस दे लुना ने डब्ल्यूएचओ के साथ मिलकर की थी। जिससे मानव हृदय संबंधी रोगों की जानकारी पाकर एक स्वस्थ जीवन शैली को अपनाकर हृदय संबंधी रोगों से दूर रह सके।

विश्व हृदय दिवस का महत्त्व

विश्व हृदय दिवस विश्वभर में हृदय से संबंधित बीमारियों से लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है। क्योंकि विश्व भर में हृदय रोगों से मरने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है। इस दिन लोगों को हृदय को बचाने से संबंधित उपायों के बारे में बताया जाता है।व स्वास्थ्य जांच इत्यादि को बढ़ावा देने के साथ ही लोगों को इसके बारे में जानकारी देकर धूम्रपान आदि छोड़कर अपने जीवन शैली में बदलाव लाने व व्यायाम के महत्व को समझा कर प्रत्येक दिन व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। जोकि आज के दिन के इस भाग दौड़ भरी जिंदगी के लिए बहुत जरूरी है।

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हमारे शरीर में हृदय किसे कहते हैं।

हृदय हमारे शरीर का एक पेशी अंग है। जोकि मानव शरीर के परिसंचरण तंत्र के केंद्र में होता है। इस प्रणाली में कोशिका, शिराओं और धमनियों का एक नेटवर्क होता है। यहां से रक्त वाहिका है हमारे शरीर के सभी भागों में रक्त को लेकर जाती हैं। जिसके कारण हम यह कह सकते हैं कि यह हमारे शरीर का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है।

हृदय रोग के प्रकार

हृदयाघात:-आमतौर पर हृदयाघात (हार्ट अटैक)या दिल के दौरे के रूप में जाना जाता है।जिसके तहत दिल के कुछ भागों में रक्त संचार में बाधा होती है जिससे दिल की कोशिकाएं मर जाती।

रूमेटिक हृदय रोग:-रूमेटिक फीवर रोमांटिक हृदय रोग एक ऐसी अवस्था है।जिसमें हृदय के वाल्व एक बीमारी की प्रक्रिया से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।यह प्रक्रिया स्ट्रैप्टॉकोक्कल बैक्टीरिया के कारण गले के संक्रमण से शुरू होती है।यदि इसका इलाज नहीं किया जाए तो यह गले का संक्रमण रोमांटिक बुखार में बदल जाता है।

हृदय की विफलता:-गुर्दे की विफलता का सीधा सा अर्थ है आपका हृदय जितना आवश्यक है। उतने अच्छे तरीके से रक्त की पंपिंग नहीं कर रहा है। हृदय की विफलता का अर्थ यह नहीं है। कि आपके हृदय ने कार्य करना बंद कर दिया है या आपको हृदय घात हो रहा है इससे कन्जेस्टिव हार्ट फैलियर भी कहा जाता है।

पेरिकार्डियल बहाव:-पेरिकार्डियल स्थान में द्रव्य का मात्रा से अधिक भर जाना। यह स्थानीय प्रणाली गत विकारों के कारण हो सकता है। पेरिकार्डियल बहाव तेज व लंबे समय के लिए हो सकता है तथा इसके विकसित होने में लगने वाले समय का रोगी के लक्षणों पर एक गहरा प्रभाव हो सकता है।

जन्मजात खराबियां:-जन्म से ही ह्रदय रोग जन्म के समय हृदय की संरचना की खराबी के कारण होता है। जो की हृदय में जाने वाले रक्त के सामान्य प्रवाह को बदल देता है।

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हृदय रोग के कारण

इस भागदौड़ भरे जीवन में शारीरिक क्रियाओं की कमी व्यायाम ना करना उच्च रक्तचाप,उच्च रक्त शर्करा यानी मधुमेह है। उच्च रक्त कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान,अत्यधिक शराब का सेवन करना व पारिवारिक हृदय रोग का इतिहास,अत्यधिक मोटा होना,उच्च वसायुक्त भोजन करना तनाव ग्रस्त जीवन जीना इत्यादि हैं।

हृदय रोग से बचाव के तरीके

  • हृदय रोगों को हम हमारी जीवनशैली में परिवर्तन करके रोक सकते हैं।
  • जिसमें अपनी स्वच्छता का ध्यान रखें।
  • धूम्रपान छोड़े।
  • अपनी स्वास्थ्य स्थितियों को नियंत्रण में करें जैसे कि हाई ब्लड प्रेशर हाई कोलेस्ट्रॉल और शुगर।
  • सप्ताह के अधिकांश दिनों में कम से कम 30 मिनट का व्यायाम करें।
  • अगर व्यायाम पसंद ना हो तो योग और ध्यान भी कर सकते हैं।
  • अपने खाने में नमक और फैट को कम करें।
  • अपनी कद और उम्र के हिसाब से सही वजन बनाए रखें।
  • अपने तनाव को कम करें,और उसका प्रबंधन करें इत्यादि।

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महात्मा गांधी पर हिंदी में निबंध

महात्मा गांधी पर हिंदी में निबंध

प्रस्तावना

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का महान नेता माना जाता है।महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869को गुजरात राज्य के पोरबंदर नामक गांव में हुआ था ।इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। और गांधी जी ‘बापू’ के नाम से भी जाने जाते हैं।

प्रारंभिक जीवन

इनके वट वृक्ष रुपी पिता का नाम करमचंद गांधी था। इनके पिता राजकोट के दीवान थे। इनकी ममतामयी मां का नाम पुतलीबाई था। जो करमचंद गांधी जी की चौथी पत्नी थी। गांधी जी की मां बहुत ही धार्मिक वआध्यात्मिक प्रवृत्ति की थी। उनकी दिनचर्या घर और मंदिर में पूजा पाठ करने में बटी हुई थी। वह हमेशा उपवास रखती थी और परिवार में कोई भी व्यक्ति बीमार हो जाता तो वह उसकी सेवा करने में दिन रात एक कर देती थी। महात्मा गांधी का लालन पालन वैष्णव मत को मानने वाले परिवार में हुआ औरउनके जीवन पर कठिन नीतियों वाले जैन धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा जिसके सिद्धांत सत्य अहिंसा एवं विश्व की सभी वस्तुओं को शाश्वत मानना है। उन्होंने अपने जीवन में स्वाभाविक रूप से सत्य ,अहिंसा , शाकाहार ,आत्म शुद्धि के लिए उपवास और विभिन्न धर्मों को मानने वालों के बीच परस्पर भाईचारे की भावना को अपनाया। महात्मा गांधी के व्यक्तित्व पर उनकी माता के चरित्र की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।महात्मा गांधी एक औसत विद्यार्थी थे। वह पढ़ाई वह खेल दोनों में ही इतने होशियार नहीं थे। वे स्कूल से आने के बाद अपनी मां के घरेलू कामों में हाथ बंटाते थे। तथा अपने बीमार पिता की सेवा करते थे। समय मिलने पर महात्मा गांधी दूर तक अकेले ही सैर करने निकल जाते थे । महात्मा गांधी को सैर करना बहुत पसंद था। महात्मा गांधी ने सदैव बड़ों की आज्ञा का पालन करना सीखा उनमें कमियां निकालना नही। महात्मा गांधी की किशोरावस्था उनके आयु वर्ग के अधिकांश बच्चों से अधिक नादानियों भरी नहीं थी। अगर वह कोई गलती कर भी देते थे तो हर गलती के बाद वह स्वयं वादा करते कि फिर कभी ऐसा नहीं करूंगा और अपने वादे पर अटल रहते। उन्होंने सच्चाई और बलिदान के प्रतीक प्रहलाद और हरिश्चंद्र जैसे पौराणिक हिंदू नायकों को अपने जीवन केआदर्श के रूप में अपनाया। महात्मा गांधी जब स्कूल में पढ़ते थे उसी समय 13 वर्ष की आयु में ही एक व्यापारी की पुत्री कस्तूरबा से उनका विवाह कर दिया गया।

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युवावस्था में गांधी जी

युवावस्था में गांधीजी-सन 1887 में महात्मा गांधी ने जैसे-तैसे मुंबई यूनिवर्सिटी की मैट्रिक परीक्षा पास की और भावनगर में स्थित सामलदास कॉलेज में प्रवेश लिया। अचानक गुजराती से अंग्रेजी भाषा में उन्हें व्याख्यानों को समझने में दिक्कत आने लगी इसी बीच उनके भविष्य को लेकर उनके परिवार में चर्चा चल रही थी। महात्मा गांधी डॉक्टर बनना चाहते थे लेकिन

वैष्णव परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें चिरफाड की इजाजत नहीं थी। साथ ही यह भी स्पष्ट था कि यदि उन्हें गुजरात के इसी राजघराने में ऊंचा पद प्राप्त करने की जो उनके परिवार में परंपरा चली आ रही है उन्हें निभाना है तो उन्हें बैरिस्टर बनना पड़ेगा और ऐसे में गांधीजी को बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड जाना पड़ा।

वैसे भी गांधीजी का मन उनके सामलदास कॉलेज में पढ़ाई करने में नहीं लग रहा था इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को सहज ही स्वीकार कर लिया उनके मन में इंग्लैंड की छवि दार्शनिकों और कवियों की भूमि संपूर्ण सभ्यता के केंद्र के रूप में थी। महात्मा गांधी सितंबर 1888 में लंदन पहुंच गए वहां पहुंचने के 10 दिन बाद वह लंदन के चार कानून महाविद्यालयों में गए तथा उनमें से एक इनर टेंपल में दाखिला ले लिया।

ट्रांसवाल सरकार ने 1906 में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय जनता के पंजीकरण के लिए विशेष रूप से एक अपमानजनक अध्यादेश जारी किया। सन उन्नीस सौ छह में जोहानेसबर्ग में भारतीयों ने गांधी जी के नेतृत्व में एक विरोध जनसभा का आयोजन किया और इस अध्यादेश के उल्लंघन तथा इसके परिणाम स्वरूप दंड भुगतने की शपथ ली।इस प्रकार पहली बार महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का प्रयोग सर्वप्रथम दक्षिण अफ्रीका में किया जो वेदना पहुंचाने के बजाय उन्हें झेलने विद्वेषण प्रतिरोध करने और बिना हिंसा किए उससे लड़ने की नई तकनीक थी। इसके पश्चात दक्षिण अफ्रीका में 7 वर्ष से भी अधिक समय तक संघर्ष चलता रहा। इसमें अनेक उतार-चढ़ाव आते रहे,लेकिन महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय अल्पसंख्यकों के छोटे से समुदाय ने अपने शक्तिशाली प्रतिपक्षियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। अनेकों भारतीयों ने अपने आत्म सम्मान को चोट पहुंचाने वाले इस कानून के सामने झुकने के बजाय अपनी नौकरी व आजादी की बलि चढ़ाना अधिक पसंद किया।

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गांधी जी का राजनीतिक व सामाजिक जीवन

गांधीजी सन 1914 में वापस भारत लौट आए। उनके लौटने पर भारत के लोगों ने उनका बड़े धूमधाम से स्वागत किया और उन्हें महात्मा पुकारना शुरू कर दिया।उन्होंने 4 वर्षों तक भारतीय स्थिति को जाना व उन लोगों को तैयार किया जो उनका साथ सत्याग्रह में भारत में प्रचलित सामाजिक व राजनीतिक बुराइयों को हटाने में दे सकते थे।

सन 1919 में जब अंग्रेजों ने रोलेट एक्ट जारी किया तो गांधी जी ने इसका जमकर विरोध किया तथा सत्याग्रह आंदोलन की घोषणा कर दी। गांधी जी के अथक प्रयासों से अंग्रेजों को रोलेट एक्ट हटाना पड़ा।

इस कामयाबी के बाद महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिए कई और अभियान किए जिनमें से सत्याग्रह और अहिंसा के विरोध जारी रखें, असहयोग आंदोलन, नागरिक अवज्ञा आंदोलन, दांडी यात्रा तथा भारत छोड़ो आंदोलन किया। गांधीजी के इन सभी अथक प्रयासों से भारत वर्ष को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिली।हमारी आजादी के 1 वर्ष बाद ही नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को गांधी जी को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। और यह महान आत्मा सदा-सदा के लिए पंचतत्व में विलीन हो गए ।

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उपसंहार

गांधी जी के द्वारा हमारी आजादी के लिए किए गए सभी कार्य हमें सदैव प्रेरणा देते रहेंगे। गांधीजी भले ही आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके विचार सदा सदा के लिए हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे। विश्वभर में महात्मा‌ गांधी सिर्फ एक नाम नहीं है बल्कि शांति और अहिंसा का प्रतीक है। सन 2007 से संयुक्त राष्ट्र संघ ने गांधी जयंती को “विश्व अहिंसा दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की।

गांधीजी के बारे में प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी की हाड मांस से बना ऐसा कोई मनुष्य भी धरती पर कभी आया था।

Hindi Divas per essay।। हिन्दी दिवस पर निबंध

प्रस्तावना

भारत भूमि पर हर वर्ष 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिन्दी विश्व भर में बोली जाने वाली भाषाओं में से एक प्रमुख भाषा है। जो विश्व भर की सभी भाषाओं में से एक प्राचीन भाषा है जो सरल समृद्ध भाषा होने के साथ-साथ हम भारतीयों की राजभाषा भी है। हमारी हिन्दी भाषा ने हमें विश्व भर में एक नई पहचान दिलाई है।आप जानते ही हैं की हिंदी भाषा विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा है।

हिंदी दिवस उपहार विज्ञापन

हिंदी भाषा का इतिहास

संविधान सभा ने एकमत से भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। साथ ही हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने व प्रतिपादित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिस के अनुरोध पर सन 1953 में समस्त भारत में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाये जाने का निर्णय लिया गया।

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हाल ही के दिनों में हिन्दी का महत्व

अखंड भारत वर्ष में धीरे-धीरे हिंदी भाषा का प्रचलन बढ़ा और हिंदी भाषा ने आज के दिनों में हर भारतीय के दिल में अपनी जगह बना ली संविधान में हिंदी भाषा का उल्लेख राजभाषा के रूप में ही किया गया है। लेकिन हर भारतीय इसे अपनी राष्ट्रभाषा मानता है। हमारी भाषा वैश्विक स्तर पर भी बहुत पसंद की जाती है हिंदी भाषा के कारण हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता विश्व के कोने-कोने में अपनी छाप छोड़ती है। आज दुनिया के हर देश से विद्यार्थी हमारी भाषा और संस्कृति को जानने के लिए हमारे देश आते हैं जो हम हिंदुस्तानियों के लिए गर्व की बात है।

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हिंदी दिवस कब और क्यों मनाया जाता है।

भारतवर्ष में हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है क्योंकि हिंदी हम हिंदुस्तानियों की राष्ट्रभाषा है किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उस देश की पहचान और गौरव होती है। हमारी हिंदी भाषा के प्रति प्रेम व सम्मान प्रकट करना हमारा कर्तव्य है। इस कर्तव्य को समझते हुए हर वर्ष 14 सितंबर के दिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक साक्षर निरक्षर हर व्यक्ति हिंदी भाषा को सम्मान देता है।

अखंड भारत का हर व्यक्ति इस भाषा को आसानी से बोल व समझ लेता है और यह हमारी भाषा की पहचान भी है। इस भाषा को बोलने व समझने में कोई परेशानी नहीं होती। पहले के समय में दुनिया में अंग्रेजी जी का ज्यादा चलन नहीं हुआ करता था। तब हिंदुस्तानियों की भाषा हिंदी भारत से बाहर भी हर हिंदुस्तानी के लिए सम्मानीय होती थी।लेकिन बदलते समय के साथ अंग्रेजी भाषा ने भारत की जमीन पर अपने पांव फैलाना शुरू कीया।जिसकी वजह से आज हमारी राष्ट्रीय भाषा को हमें 1 दिन के लिए मनाना पड़ रहा है ।

पहले के समय में हमारे विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम बहुत ही कम हुआ करता था।आज इन अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की मांग बढ़ने के कारण देश के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे हिंदी में पिछड़ रहे हैं।अगर देखा जाए तो उन्हें ठीक से हिंदी लिखनी और बोलनी भी नहीं आती।भारत भूमि पर रहकर हमें हमारी भाषा हिंदी को महत्व न देकर अंग्रेजी भाषा को महत्व देना भी हमारे लिए एक बहुत बड़ी शर्म की बात है।

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शिक्षा के व्यवसायीकरण के कारण पिछड़ती हिन्दी

आजकल शिक्षा के बाजारीकरण के कारण हर गली मोहल्ले में खुल रहे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों ने अंग्रेजी भाषा का एक बाजार तैयार कर दिया है। इस फलते फूलते अंग्रेजी भाषा के बाजार में हिंदी भाषी व्यक्ति को एक अनपढ़ गंवार के रूप में देखा जाता है। जो कि हम भारतीयों के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है।

हम आज के दिन हमारे देश में अंग्रेजी के गुलाम बनकर बैठे हैं। और हमारी भाषा हिन्दी को उचित मान-सम्मान नहीं दे पा रहे हैं। हम व आप जब भी किसी बड़े होटल या व्यवसायिक लोगों के बीच खड़े होकर गर्व से अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को बोल रहे होते हैं। तो वह हमें कम पढ़ा लिखा व गंवार समझते हैं। हमारे सामाजिक परिवेश में अगर कोई बच्चा अंग्रेजी में अच्छा बोलकर कविता आदि सुना दे तो उसके परिवार के लोग बहुत गर्व महसूस करते हैं। इन्हीं कारणों से हमारी भाषा हिन्दी पिछड़ती जा रही है।

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उपसंहार

आज हर इंसान अपने बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में प्रवेश दिलाता हैं। इन अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में विदेशी भाषाओं पर तो बहुत ध्यान दिया जाता है। लेकिन भारतवर्ष की राजभाषा हिंदी की तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। इन स्कूलों का मानना है कि हिंदीभाषी के लिए रोजगार के लिए अवसर कोई खास नहीं है। हिंदी दिवस को मनाने का अर्थ है लुप्त हो रही हिंदी भाषा को जीवित रखने का एक प्रयास।

वीडियो यहां देखें :-https://www.youtube.com/watch?v=chM35n-wIsM

essay ganesh chaturthi essay in hindi ||गणेश चतुर्थी पर हिन्दी में निबंध

गणेश चतुर्थी पर निबंध 1 {100 शब्द}

गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला एक बहुत ही प्रसिद्ध त्योहार है। इसे हर वर्ष अगस्त में सितंबर के महीने में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व को माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र भगवान गणेश के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। जो समृद्धि और बुद्धि के भगवान माने जाते हैं। बुद्धि और समृद्धि दोनों को पाने के लिए लोग गणेश चतुर्थी के समय भगवान गणेश की पूजा करते हैं। भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्ति को घर पर लाते हैं। और 10 दिन तक उनकी भक्ति करते हैं। और 11 वे दिन अनंत चतुर्दशी को भगवान गणेश का विसर्जन करते हैं।

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गणेश चतुर्थी पर निबंध 2 {200 शब्द}

गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मदिन पर उनके स्वागत के लिए मनाए जाने वाला एक हिंदू पर्व है। भगवान गणेश जो कि माता पार्वती और भगवान शिव के प्यारे बेटे हैं। इस पर्व के दिन भगवान गणेश के धरती पर पधारने पर पूरे भारतवर्ष में हिंदू धर्म के लोग खुशियां मनाते हैं। व भगवान गणेश से मनचाहा आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।लोगों का मानना है कि भगवान गणेश जीवन से सभी बाधाओं और मुश्किलों को हर लेते हैं। व बुद्धि और समृद्धि प्रदान कर जीवन को खुशियों से भर देते हैं। इसीलिए कोई भी नया काम शुरू करने से पहले भारत वर्ष में लोग भगवान गणेश की पूजा करते हैं। भगवान गणेश सभी बच्चों के प्यारे भगवान हैं इसलिए बच्चे प्यार से उन्हें दोस्त गणेशा भी कहते हैं।गणेश चतुर्थी का पर्व हर साल 10 दिनों के लिए अगस्त और सितंबर के महीने में मनाया जाता है इस पर्व की पूजा अर्चना चतुर्थी के दिन से शुरुआत कर अनंत चतुर्दशी के दिन पूर्ण होती है।

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गणेश चतुर्थी पर निबंध 3 {300 शब्द}

भारतवर्ष में गणेश चतुर्थी एक बहुत ही हर्षोल्लास व उत्साह से मनाया जाने वाला त्यौहार है।यह भारत के विभिन्न राज्यों में मनाया जाता है। हालांकि खासतौर पर महाराष्ट्र राज्य में यह हिंदू धर्मावलंबियों का बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है। इस पर्व पर भक्तगण बहुत ही प्रफुल्लित होते हैं। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व हर साल भगवान गणेश के जन्म दिवस पर मनाया जाता है। भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता के नाम से भी बुलाया जाता है। अर्थात विघ्नहर्ता का अर्थ राक्षसों के लिए मुश्किल पैदा करने वाला व बाधाओं का हर लेने वाला होता है। गणेश चतुर्थी 11 दिनों तक के लंबे समय तक चलने वाला हिंदू उत्सव है।जिसकी शुरुआत चतुर्थी के दिन घर या मंदिर में गणेश जी की मूर्ति की स्थापना कर की जाती है। तथा यह पर्व गणेश विसर्जन के साथ अनंत चतुर्दशी पर खत्म होता है। इस पर्व पर भक्तगण मोदक चढ़ाते हैं। भक्ति गीत गाते हैं व मंत्रोच्चारण कर भगवान गणेश से बुद्धि व समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इसे विभिन्न समुदायों मंदिरों पंडालों में अनेक समूहों द्वारा परिवार या अकेले में मनाया जाता है। गणेश विसर्जन अर्थात मूर्ति को पानी में बहाना पूजा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण भाग होता है।गणेश विसर्जन का मुहूर्त के अनुसार किया जाता है विसर्जन के अंदर बच्चे बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं व भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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गणेश चतुर्थी पर निबंध 4 {400 शब्द}

गणेश उत्सव भारत भूमि पर हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा मनाया जाने वाला एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है। जो हर वर्ष अगस्त व सितंबर महीने में 10 दिन के लिए मनाया जाता है। माना जाता है। कि इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इसलिए हिंदू धर्म के लोग इस पर्व को गणेश उत्सव के रूप में मनाते हैं। भगवान गणेश सभी भक्तजनों के प्रिय हैं खासतौर से बच्चों के यह ज्ञान व धन देने वाले व दुखों को हरने वाले भगवान माने जाते हैं। जो बच्चों में दोस्त गणेशा के नाम से भी प्रसिद्ध है। भगवान गणेश शिव और माता पार्वती के प्रिय पुत्र हैं। कहा जाता है कि एक बार भगवान गणेश का सर भगवान शिव के द्वारा काट दिया गया था। लेकिन फिर एक हाथी का सिर उनके धड़ से जोड़ दिया गया इस तरह से भगवान गणेश को दोबारा जीवन मिला जिसे गणेश उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।इस पर्व पर लोग भगवान गणेश की मूर्ति को अपने घर पर ले जाते हैं व 10 दिनों तक पूरी श्रद्धा से उसकी पूजा करते हैं।अनंत चतुर्दशी को 11वे दिन गणेश विसर्जन करते हैं और अगले वर्ष दोबारा आने की कामना करते हैं लोग भगवान गणेश की पूजा बुद्धि व समृद्धि की प्राप्ति के लिए करते हैं। इस उत्सव को विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। शुक्ल पक्ष चतुर्थी में भाद्रपद के हिंदी महीने में इस उत्सव को मनाया जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि पहली बार चंद्रमा के द्वारा गणेश जी का व्रत रखा गया था। क्योंकि अपने दुर्व्यवहार के लिए गणेश जी द्वारा चंद्रमा शापित थे। गणेश जी की पूजा के बाद चंद्रमा को ज्ञान तथा सुंदरता का आशीर्वाद मिला।भगवान गणेश हिंदू धर्मावलंबियों के सबसे बड़े भगवान माने जाते हैं जो अपने भक्तों को धन ऐश्वर्य बल व ज्ञान प्रदान करते हैं। इसलिए भक्तगण इन सभी कामनाओं के साथ पूजा अर्चना कर अनंत चतुर्दशी पर गणेश उत्सव का समापन करते हैं।

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गणेश चतुर्थी पर निबंध 5 {500 शब्द}

भारतवर्ष में गणेश चतुर्थी अगस्त व सितंबर माह में 10 दिन तक मनाया जाने वाला एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है। भक्त गणेश पर्व की तैयारी एक महीना हफ्ता या उसी दिन से शुरू कर देते हैं। पर्व के दौरान बाजारों में अपनी अलग ही एक रौनक रहती है। हर जगह दुकाने गणेशजी की मूर्तियों से भरी रहती हैं। और मूर्ति की बिक्री को बढ़ाने के लिए बिजली की रोशनी की जाती है। भक्तगण पूरी श्रद्धा से गणेश जी की मूर्ति को अपने घर पर ले जाते हैं। और मूर्ति की स्थापना करते हैं। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है। कि जब गणेश जी घर पर आते हैं तो ढेर सारी खुशियां सुख समृद्धि घर पर लेकर आते हैं। 10 दिन बाद विसर्जन के समय वह हमारे जीवन की सभी बाधाएं अपने साथ ले जाते हैं भगवान गणेश को बच्चे बहुत प्रिय होते हैं और उनके द्वारा उन्हें मित्र गणेश के नाम से भी बुलाया जाता है। समाज में लोगों का समूह भगवान गणेश की पूजा करने के लिए पंडाल तैयार करता है। व लोग पंडाल को फूल और प्रकाश के द्वारा आकर्षक रूप से सजा ते है। आसपास में रहने वाले समाज के लोग प्रतिदिन उस पंडाल में पूजा अर्चना व प्रार्थना के लिए आते हैं व भगवान गणेश से प्रार्थना करते हैं कि वह उनकी मनोकामना पूरी करें। इस पर्व पर प्रसाद के लिए मोदक का प्रयोग ज्यादातर किया जाता है। भक्तजनों का मानना है कि भगवान गणेश को मोदक सर्वाधिक पसंद है। गणेश चतुर्थी की पूजा दो प्रक्रियाओं में की जाती है जिनमें पहला मूर्ति की स्थापना और दूसरा मूर्ति का विसर्जन इसे गणेश विसर्जन भी कहा जाता है।रिती में प्राण प्रतिष्ठा पूजा की जाती है। मूर्ति में उनके पवित्र आगमन के लिए तथा शोधसोपचरा (भगवान को 16 तरीके से सम्मान देने के लिए) 10 दिनों की पूजा के दौरान लाल फूल गुड मोदक लाल चंदन कपूर नारियल व दुर्वा घास चढ़ाने की प्रथा है। लगातार 10 दिन की पूजा अर्चना के बाद 11वे दिन पूजा की समाप्ति के समय गणेश विसर्जन में लोग भारी संख्या में शामिल होकर हर्षोल्लास के साथ गणेश विसर्जन करते हैं।

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गणेश चतुर्थी पर निबंध 6 {600 शब्द}

गणेश चतुर्थी पर्व पर हिंदू धर्म के सबसे आराध्य देवता गणेश जी की पूजा की जाती है। यह त्यौहार खासतौर पर महाराष्ट्र में मनाया जाता है। हालांकि अब यह त्यौहार भारत के लगभग सभी राज्यों में मनाया जाता है। लोग पूरी श्रद्धा के साथ अगस्त व सितंबर माह में 10 दिन के लिए मंदिरों व अपने घरों में गणेश जी की मूर्ति की स्थापना कर इस पर्व को मनाते हैं।उनका यह मानना है कि गणेश जी हर साल ढेर सारी खुशियां व संपन्नता के साथ आते हैं। और जाते वक्त सभी परेशानियों व दुखों को अपने साथ ले जाते हैं। इस पर्व को मनाने के लिए लोग विभिन्न प्रकार की तैयारियां करते हैं। यह पर्व भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी पर शुरू होकर 11 वे दिन अनंत चतुर्दशी पर खत्म होता है हिंदू धर्मावलंबियों के लिए गणेश जी की पूजा के अनेकों मायने होते हैं। ऐसा माना जाता है। की जो कोई पूरी भक्ति आस्था श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान गणेश की पूजा करता है। उसे भगवान गणेश खुशी ज्ञान धन ऐश्वर्य तथा समृद्धि प्रदान करते हैं। गणेश चतुर्थी पर्व के दिन लोग जल्दी सुबह उठकर स्नान कर कर साफ कपड़े पहन कर भगवान की पूजा करते हैं। जय हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों के अनुसार मंत्रोच्चारण व आरती व भक्ति गीत गाकर भगवान गणेश की मूर्ति के सामने मोदक नारियल कपूर लाल चंदन लाल फूल गुड आदि चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि पहले के समय में यह उत्सव केवल कुछ परिवारों में ही मनाया जाता था। बाद में यह उत्सव बड़े रूप में मनाया जाने लगा व मूर्ति स्थापना और विसर्जन को शामिल किया गया। अगर ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो 1983 में इसे लोकमान्य तिलक (सामाजिक कार्यकर्ता स्वतंत्रता सेनानी) के द्वारा भारतीयों को अंग्रेजी शासन से बचाने के लिए गणेश पूजा की प्रथा को अपनाकर इस उत्सव की शुरुआत की। हाल के दिनों में इस पर्व को एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। व गणेश उत्सव को कई नामों से जाना जाता है। जैसे गणपति उत्सव एकदन्ता असीम, शक्तियों के भगवान, लंबोदरा, विनायक भगवानों के भगवान, आदि व अंत में 10 दिन की पूजा अर्चना के बाद 11 वे दिन अनंत चतुर्दशी को लोग गणेश जी को विदा करते हैं। और प्रार्थना करते हैं कि अगले वर्ष फिर से पधारे वह गणपति विसर्जन कर इस पर्व को समाप्त करते हैं।

teachers day speech in hindi।। शिक्षक दिवस पर हिंदी में भाषण

नमस्कार आज हम बात करने जा रहे हैं शिक्षक दिवस के बारे में साथियों शिक्षक दिवस इस भारत भूमि पर जन्मे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की याद में हर वर्ष 5 सितंबर को मनाया जाता है। साथियों डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का नाम बीसवीं सदी के विद्वानों में सबसे शीर्ष पर आता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक दार्शनिक एक राजनैतिक  एक शिक्षक व भारत के पहले उपराष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। 1954 में उनको सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया। व सन 1962 से डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में उनके जन्मदिवस 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मना कर उनके योगदान को याद कर उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।

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साथियों इस मां भारती की धरा पर शिक्षकों का सम्मान प्राचीन समय से ही रहा है। इसीलिए भारत देश को विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है

गुरु को ब्रह्मा विष्णु महेश कहां गया है जैसे कि गुर्रुर ब्रह्मा गुर्रुर विष्णु गुर्रुर देवो महेश्वरः गुर्रुर साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः संत कबीर दास जी गुरु का महत्व समझाते हुए गाते थे। “गुरु गोविंद दोऊ खडे काके लागू पाय बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताय कबीरा गोविंद दियो बताय” अर्थात गुरु और गोविंद एक साथ खड़े हो तो किसे प्रणाम करना चाहिए।

ऐसी स्थिति में गुरु के श्री चरणों में शीश झुकाना उत्तम है। जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविंद के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लेकिन साथियों समय अनुसार बदलती हुई व्यवस्थाओं व शिक्षा के बाजारीकरण में शिक्षक के महत्व को गौण कर दिया है।

आज के दिन शिक्षा को एक व्यापार के रूप में देखा जाने लगा है। इस शिक्षा व्यवस्था में ऐसे लोग भी प्रवेश कर गए हैं। जिनका शिक्षा व नैतिकता से दूर – दूर तक कोई नाता नहीं है। उनको सिर्फ मोटी फीस व ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना ही अच्छा लगता है। इस फीस का बड़ा हिस्सा स्कूल सुविधाओं के नाम पर वसूलता है। व मोटा पैसा स्कूल का मालिक कमाता है। शिक्षकों को तो औसत वेतन ही मिल रहा है। इस व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि विद्यार्थी का शिक्षक के प्रति विश्वास कम हो गया है। व आत्मीयता स्नेह और आदर को तिलांजलि दी जा रही है। अगर प्राचीन व्यवस्था को देखा जाए तो शिक्षा पूरी होने के बाद शिष्य गुरु दक्षिणा स्वरूप गुरु को जो सामर्थ्य अनुसार दे पाता था।

गुरु स्वीकार करते थे। हर अमीर गरीब को एक ही तरह की तालीम प्रदान करते थे।आज के दिन ऐसा संभव नहीं है। यह शिक्षा व्यवस्था माता – पिता समाज व हर जगह अपना दशं दिखा रही है। आज के संदर्भ में यह शब्द कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी

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गुरु अब शिक्षा को बेचने वाले तरफदार बन गए। स्कूल अब व्यापार बन गए। शिष्य अब गुरु के ग्राहक बन गए। शिष्य अब नंबरों के लिए आंख दिखाने वाले होशियार बन गए। क्योंकि स्कूल अब व्यापार बन गए ये पैसे गुरु शिष्य के रिश्ते को दरकिनार कर गए आजकल कहां रहती है। दिल में गुरु के चरणों में शीश झुकाने की अब तो बस लगी रहती है। मन में फीस कम करवाने की माता-पिता खुश होते हैं। हमारा बच्चा शिक्षा पा एक बड़ा आदमी बन जाएगा। वह इन हर चौक-चौराहों व गली मोहल्लों में खुली शिक्षा की दुकानों में शिक्षा पा वह माता पिता व गुरु शिष्य के रिश्ते को निभायेगा। अजी! लेकिन यह मत भूलो इस बच्चे ने एनुअल डे पर मार्केटिंग सीखी है। सिर्फ दिखावे के अलावा इन स्कूलों की शिक्षा फिकी है। इन बच्चों ने तो हर साल स्कूल फीस को ऊपर जाते देखा है। लेट फीस वाले बच्चों को क्लास टीचर के आगे गिड़गिड़ाते देखा है | हर कदम – कदम पर पैसे को आड़े आते देखा है। यह मत भूलो वह इसी सीख को जीवन में अपनायेगा।  आने वाले समय में पैसों की खातिर  वह माता-पिता व गुरु की महिमा को भूल जाएगा और हर रिश्ते में वह पैसा ही बनाना चाहेगा 

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लेकिन साथियों आज शिक्षकों अभिभावकों व विद्यार्थियों में व्यवस्थाओं के कारण कितने ही मतभेद हो हमें हमारे शिक्षकों को अवश्य सम्मान देना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए महाभारत काल के बालक एकलव्य को बालक एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य को अपना गुरु मानते थे। लेकिन गुरु द्रोणाचार्य ने बालक एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया था। तो बालक एकलव्य एकांत जंगल में गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाकर मूर्ति से प्रेरणा लेकर धनुर्विद्या सीखने लगा। उसकी गुरुभक्ति व एकाग्रता के कारण वह धनुर्विद्या में बहुत ही निपुण हो गया। संयोगवश गुरु द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों को लेकर एक बार जंगल में आए तो उनके साथ एक कुत्ता था। जो थोड़ा आगे निकल गया। कुत्ता वहां पहुंच गया। जहां बालक एकलव्य धनुर्विद्या सीख रहे थे। वह बालक एकलव्य को देखकर भौंकने लगा। तो बालक एकलव्य ने सात बाण छोड़कर कुत्ते के मुंह को बाणों से भर दिया। बाणों से भरा मुंह लेकर कुत्ता गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचा। तब अर्जुन ने कुत्ते को देखकर कहा गुरुदेव यह विधा तो मैं भी नहीं जानता। यह कैसे संभव हुआ। तो गुरु द्रोणाचार्य ने आगे जाकर देखा तो बालक एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति के सामने बैठ धनुर्विद्या सीखने में लगा हुआ है। गुरु द्रोणाचार्य बालक एकलव्य की अटूट श्रद्धा को देखकर बोले मेरी मूर्ति को सामने रखकर धनुर्विद्या तो सीख ली। किंतु मेरी गुरु दक्षिणा कौन देगा। तो बालक एकलव्य ने कहा गुरुवर जो आप मांगे। तो गुरु द्रोणाचार्य ने कहा तुम्हे मुझे दाएं हाथ का अंगूठा देना होगा। बालक एकलव्य ने एक पल में बिना विचार किये अंगूठा गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर दिया। धन्य है वह बालक एकलव्य जिसने साहस त्याग व समर्पण का परिचय दिया। जिसके कारण आज भी बालक एकलव्य को गुरु भक्ति के लिए याद किया जाता है। शब्दों के साथ मैं सभी गुरुओं को नमन करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूं। जय हिंद जय भारत

इस भाषण को सुनने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें https://youtu.be/z1O-bkSgFyo

शहीद भगत सिंह जी पर निबंध

प्रस्तावना

भारतवर्ष की धरा पर जन्मे एक महान क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम वीर भगत सिंह जिन्होंने भारत की आजादी के आंदोलन में बहुत ही छोटी उम्र में कूद अंग्रेजी हुकूमत के दांत खट्टे कीये। भगत सिंह जी से प्रेरित होकर मां भारती के बहुत से युवाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। आगे चलकर उनकी प्रसिद्धि को देखते हुए क्रूर ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया।

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शहीदे आजम भगत सिंह जी का प्रारंभिक जीवन

शहीद भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब प्रांत के एक सिख परिवार में हुआ। उनकी माता जी का नाम विद्यावती कौर था वह पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। जो कि स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष में भागीदारी के कारण जेल में थे। भगत सिंह जी बचपन से ही आक्रामक स्वभाव के थे। उन्होंनेे बचपन में ही अपने परिवार को आजादी के लिए संघर्ष करते हुए देखा। अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के कारण भगत सिंह के मन में उनके खिलाफ भारी रोष उत्पन्न हो गया और वह रात दिन भारत देश की आजादी के लिए सोचने लगे।

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आजादी की लड़ाई में शहीदे आजम भगत सिंह जी का योगदान

आजादी की लड़ाई के संघर्ष के दौरान बड़े हो रहे भगत सिंह के मन में देश की आजादी की ज्वाला प्रबल होने लगी। वहीं जब उन्होंने अमृतसर में 13 अप्रैल साल 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड में बेकसूर लोग और मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत का मंजर देखा तो उन्होंने उग्र रूप धारण कर लिया। व अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने की ठान ली वही स्वतंत्रता संग्राम में लगातार बढ़ती हुई हिंसात्मक घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही थी तो घबरायी हुयी अंग्रेजी हुकूमत ने काकोरी कांड में राम प्रसाद बिस्मिल रोशन सिंह अशफाक उल्ला खान और राजेंद्र प्रसाद लाहिड़ी क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुना दी। इस खबर को सुन भगत सिंह बेचैन हो गए और चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया। जिसमें लाला लाजपत राय भी शामिल थे। इसके बाद साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लाला लाजपत राय पर अंग्रेजों द्वारा किए गए लाठी के प्रहार से उनकी मौत को देखकर भगत बौखला उठे और अपने दोस्त सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर उनके हत्यारों को मौत के घाट उतार दिया। उसके बाद ब्रिटिश असेंबली में गरीब किसान और मजदूरों के खिलाफ अपनी दमनकारी नीतियों को बना रहे ब्रिटिश अधिकारियों पर असेंबली में बम फेंककर ब्रिटिश हुकूमत की आंखों की किरकिरी बन गये। उनके इस कार्य को देखकर अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया व 23 वर्ष की अल्पायु में भगत सिंह व उनके दो साथियों राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई। इस तरह भगत सिंह जी ने देश को आजाद करवाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल शहीद ए आजम भगत सिंह कहलाए।

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उपसंहार

महान क्रांतिकारी शहीद ए आजम भगत सिंह जी ने अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता व हिंसात्मक गतिविधियों को देखकर यह अच्छी तरह जान लिया कि हमें कभी भी अहिंसक तरीके से आजादी नहीं मिल सकती इसलिए हमें हिंसा का रास्ता चुनना होगा। इसलिए उन्होंने हिंसा का रास्ता चुनकर भारत देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति देकर भारत के लाखों करोड़ों युवाओं को आजादी के लिए प्रेरित किया। और उनके विचार आज तक भी मां भारती के युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं।

वीडियो देखें:-https://www.youtube.com/channel/UC1RERcLmvj6uo0TS0hW7kmQ

beta beti ek saman essay in hindi ।। बेटा बेटी एक समान

साथियों लड़का-लड़की समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं।एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। लेकिन हम जीवन के धरातल पर दोनों को देखें तो लड़की आज के आधुनिक युग में भी दुनिया में अपने समान अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। कुछ लड़कियों को उनके जन्म से पहले ही मार दिया जाता है। इसका कारण अगर देखा जाए तो हमारे भारतीय समाज में एक लड़की को जन्म से ही बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जन्म के बाद कुछ इलाकों में मां- बाप उसे बोझ समझने लगते हैं। उसे घर के चूल्हा-चौका तक ही सीमित रखा जाता है। और शादी के बाद जब वह दूसरे घर जाती है, तो ससुराल में उसे घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। वही समाज में लड़के को कमाऊ, घर चलाने वाला, घर का मुखिया समझा जाता है।लेकिन साथियों समय लगातार बदल रहा है। यह युग प्रगति का युग है। तेजी से बदलती हुई दुनिया में कुछ बदलाव भी आया है। हाल ही में बहुत असमानताओं के होते हुए भी धाविका हिमा रणजीत दास ने सर्वाधिक स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। वहीं चंद्रयान-2 के सपनों को आकार देने में रितु करीधाल व एम वनीता दो महिला वैज्ञानिकों के रूप में नारी शक्ति का एक नया रूप देखने को मिला है। वही हम इतिहास के पन्नों को झांक कर देखें तो हमें रानी लक्ष्मीबाई, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, गीता फोगाट, मैरी कॉम आदि हस्तियों की कहानियां हमें आज भी साहस और ताकत देती है। साथियों हमें समय के साथ अपनी सोच को बदलना चाहिए। व बालक-बालिका एक समान की सोच हमें अपने परिवार से ही शुरू करनी चाहिए। हमें बेटा और बेटी में कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए, बल्कि दोनों को आगे बढ़ने के समान अवसर प्रदान करने चाहिए। क्योंकि बेटा-बेटी एक समान दोनों से होगा खुशहाल ज़हान, बातें करना है बहुत आसान, हम बेटियों को चाहिए सम्मान। धन्यवाद जय हिंद जय भारत इस निबंध का वीडियो देखने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें https://youtu.be/JUEt0ss0