Category: कहानियाँ

इस जहां में कुछ भी व्यर्थ नहीं है।(गुरु दक्षिणा)

गुरु दक्षिणा एक ऋषि के पास एक युवक ज्ञान प्राप्ति के लिए पहुंचा। ज्ञान प्राप्ति के बाद उसने दक्षिणा देनी चाही। गुरु ने वह चीज मांगी जो बिल्कुल व्यर्थ हो । युवक व्यर्थ चीज की खोज में निकल पड़ा। उसने मिट्टी की ओर हाथ बढ़ाया । मिट्टी चीख पड़ी, तुम मुझे व्यर्थ समझ रहे हो ? धरती के समस्त वैभव मेरे गर्भ से प्रकट होते हैं । शिष्य पत्थर की ओर मुड़ा। उसने कहा, ‘इन भवनों, नदी-नालों और पर्वतों में क्या मैं नहीं हूं ?’ घूमते-घूमते उसे गंदगी का ढ़ेर मिला। उसने घृणा भाव के साथ जैसे ही गंदगी की तरफ हाथ बढ़ाया तो आवाज आई, ‘क्या मुझसे बढ़िया खाद धरती पर मिलेगा? ये अन्न, फल आदि सब मेरे कारण ही है।’ युवक सोच में पड़ गया कि अगर मिट्टी, पत्थर, गंदगी का ढे़र भी इतने मूल्यवान है तो व्यर्थ क्या हो सकता है? वह गुरु के पास गया और क्षमा मांगकर उसने निवेदन किया, ‘गुरु – दक्षिणा में मैं अपना अहंकार देने आया हूं।’

 

Updated: September 5, 2018 — 10:01 am